यात्रियों की जान से खिलवाड़! कानपुर बस अड्डे पर बसों को बनाया अवैध पार्सल एक्सप्रेस, चालक-परिचालकों की कथित मिलीभगत से धड़ल्ले से ढुलाई
बिना जांच बसों में चढ़ रहे पार्सल, नियमों को ताक पर रख नकद वसूली के आरोप, अधिकृत पार्सल सेवा को हर माह लाखों का नुकसान
(Today crime news)
उत्तर प्रदेश कानपुर। शहर का शहीद मेजर सलमान अंतरराज्यीय बस अड्डा इन दिनों यात्रियों की सुविधा से अधिक कथित तौर पर अवैध पार्सलों की ढुलाई का अड्डा बनता जा रहा है। आरोप हैं कि परिवहन निगम की बसों में चालक और परिचालकों की मिलीभगत से बिना किसी जांच, पहचान सत्यापन और विभागीय अनुमति के खुलेआम पार्सल एक शहर से दूसरे शहर भेजे जा रहे हैं। यदि ये आरोप सही हैं, तो यह केवल परिवहन निगम के नियमों की धज्जियां उड़ाने का मामला नहीं, बल्कि हजारों यात्रियों की जान को रोजाना खतरे में डालने जैसा गंभीर मामला भी है।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सुबह से देर रात तक स्कूटर, ई-रिक्शा और रिक्शों के जरिए पार्सल सीधे बस अड्डे के भीतर पहुंचाए जाते हैं। कुछ ही मिनटों में ये पार्सल संबंधित बसों की डिक्की में लाद दिए जाते हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि कथित तौर पर न तो पार्सलों की कोई सुरक्षा जांच होती है और न ही भेजने वाले अथवा प्राप्तकर्ता की पहचान का सत्यापन किया जाता है। पूरी प्रक्रिया ऐसे पूरी होती है मानो सरकारी बसें नहीं, बल्कि निजी पार्सल सेवा संचालित हो रही हो।
आरोप है कि परिचालक पार्सल भेजने वाले को बस का नंबर और अपना मोबाइल नंबर भी उपलब्ध करा देते हैं, ताकि गंतव्य पर पहुंचने के बाद पार्सल सीधे उसके हाथों में सौंपा जा सके। इसके बदले नकद रकम ली जाती है, जिसका कोई सरकारी रिकॉर्ड, रसीद या लेखा-जोखा मौजूद नहीं होता। सवाल यह है कि जब पूरा लेन-देन विभागीय प्रक्रिया से बाहर हो रहा है, तो आखिर इसकी जवाबदेही किसकी होगी?
सबसे गंभीर पहलू सुरक्षा का है। बिना जांच यदि किसी पार्सल में ज्वलनशील पदार्थ, विस्फोटक सामग्री, मादक पदार्थ या कोई अन्य प्रतिबंधित सामान हो, तो उसका खामियाजा बस में बैठे सैकड़ों निर्दोष यात्रियों को भुगतना पड़ सकता है। इसके बावजूद यदि जिम्मेदार अधिकारी इस कथित खेल से अनजान बने हुए हैं, तो यह महज लापरवाही नहीं बल्कि सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।
परिवहन निगम के नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि सार्वजनिक परिवहन की बसों में भेजे जाने वाले किसी भी पार्सल की जांच और आवश्यक दस्तावेजों का सत्यापन अनिवार्य है। लेकिन आरोपों के मुताबिक बस अड्डे पर यह पूरी व्यवस्था कागजों तक सीमित होकर रह गई है और नियमों को खुलेआम ठेंगा दिखाया जा रहा है।
इस कथित अवैध व्यवस्था का सीधा नुकसान अधिकृत पार्सल सेवा प्रदाताओं को भी उठाना पड़ रहा है। बस अड्डे पर संचालित AVG Logistic के कर्मचारियों का दावा है कि चालक-परिचालकों की कथित मिलीभगत के कारण लोग अधिकृत बुकिंग काउंटर पर जाने के बजाय सीधे बसों में पार्सल भेज रहे हैं। इससे कंपनी को हर महीने लाखों रुपये के कारोबार का नुकसान हो रहा है। कर्मचारियों के मुताबिक कंपनी प्रबंधन ने कई बार विभागीय अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल आश्वासन ही मिले। नतीजा यह है कि कथित तौर पर नियमों को दरकिनार कर बसों में पार्सल भरने का सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है।
अब सवाल यह है कि जिस बस अड्डे पर हर दिन यात्रियों, अधिकारियों और कर्मचारियों की मौजूदगी रहती है, वहां यदि यह कथित खेल खुलेआम चल रहा है तो जिम्मेदार अधिकारियों की नजर आखिर क्यों नहीं पड़ रही? क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही है या फिर पूरे मामले पर किसी की मौन सहमति? यदि आरोपों में सच्चाई है, तो यह मामला केवल राजस्व हानि का नहीं, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा, परिवहन निगम की साख और सरकारी जवाबदेही से भी सीधे जुड़ा हुआ है। ऐसे में आवश्यक है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए, ताकि सरकारी बसें यात्रियों की सुरक्षित यात्रा का माध्यम बनी रहें, न कि कथित अवैध पार्सल ढुलाई का।


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