ठहर गई है घंटे की सुई कार्य के नाम पर आंख बंद

 ठहर गई है घंटे की सुई कार्य के नाम पर आंख बंद

पिछले एक साल बंद है घंटाघर का समय देखते हुई आंख नम

आपको बताते चले एक ऐसा भी समय था जब घड़ी रखना हर व्यक्ति के बस की बात नहीं थी एक घर क्या पूरे क्षेत्र में एक घड़ी होना बड़ी बात होती थी। उद्योग नगरी कहे जाने वाले कानपुर में अंग्रेजों ने मिलों और मुख्य बाजारों में श्रमिकों को यह सुविधा देने के लिए घंटाघर बनवाया था। घनी आबादी में बने इन घंटाघरों की टिक-टिक पर श्रमिक तो चलते ही थे, बल्कि पूरे इलाके का टेबल टाइम सेट होता था। सुबह समय से उठना है तो टन-टन गिनने पर घरवाले उठाते थे।

कलक्टरगंज,नया गंज चावल मंडी, हटिया आदि इलाकों की दुकानों में काम करने वाले कर्मचारी टन-टन गिन कर अपनी दिनचर्या तय करते थे। घंटाघर की टन सही वक्त बतलाता था।

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