अधिवक्ताओं को देख बैठक छोड़कर भागे नगर आयुक्त, पार्षदों का फूटा गुस्सा, तीन करोड़ के भुगतान पर महापौर ने घेरा

अधिवक्ताओं को देख बैठक छोड़कर भागे नगर आयुक्त, पार्षदों का फूटा गुस्सा, तीन करोड़ के भुगतान पर महापौर ने घेरा

15 मिनट में ही कार्यकारिणी में संग्राम, सभी दलों के पार्षद धरने पर बैठे; नगर आयुक्त के खिलाफ निंदा प्रस्ताव की तैयारी, कूड़ा उठान से कन्वेंशन सेंटर तक सवालों की लंबी फेहरिस्त पर नहीं हो सकी चर्चा


(Today crime news)

उत्तर प्रदेश कानपुर। नगर निगम में बुधवार को अफसरशाही और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के बीच टकराव सड़कों तक पहुंच गया। मोतीझील स्थित नगर निगम मुख्यालय में कार्यकारिणी की बैठक शुरू हुए अभी 15 मिनट भी नहीं बीते थे कि अधिवक्ताओं की मौजूदगी को लेकर विवाद छिड़ गया। नगर आयुक्त अर्पित उपाध्याय ने बैठक में अधिवक्ताओं के बैठने पर आपत्ति जताई और अपने अधिकारियों के साथ बैठक छोड़कर बाहर निकल गए। इसके बाद पार्षदों का गुस्सा फूट पड़ा। नगर निगम परिसर में हंगामा और नारेबाजी शुरू हो गई। विरोध में पक्ष-विपक्ष के पार्षद एकजुट होकर धरने पर बैठ गए।

नगर निगम की इस बैठक में शहर की सफाई व्यवस्था, कूड़ा उठान के टेंडर, निर्माण कार्यों की जांच, कन्वेंशन सेंटर की आय और वित्तीय फैसलों पर अधिकारियों से जवाब मांगा जाना था। लेकिन जिन सवालों पर जवाबदेही तय होनी थी, उन पर चर्चा शुरू होने से पहले ही बैठक टकराव की भेंट चढ़ गई। घटनाक्रम ने नगर निगम की कार्यप्रणाली और जनप्रतिनिधियों-अधिकारियों के बीच बढ़ती खाई को एक बार फिर उजागर कर दिया।

अधिवक्ताओं की मौजूदगी पर विवाद, बैठक छोड़कर निकले नगर आयुक्त

महापौर प्रमिला पांडेय ने बुधवार दोपहर दो बजे कार्यकारिणी की बैठक बुलाई थी। बैठक में अधिवक्ताओं की मौजूदगी पर नगर आयुक्त ने आपत्ति जताई। देखते ही देखते मामला इतना बढ़ा कि नगर आयुक्त अन्य अधिकारियों के साथ सभागार से बाहर निकल गए। उनके इस कदम से नाराज पार्षदों ने विरोध शुरू कर दिया।

पार्षदों की नाराजगी केवल अधिवक्ताओं को लेकर हुए विवाद तक सीमित नहीं रही। उनका असंतोष कार्यकारिणी और सदन के फैसलों को निरस्त किए जाने जैसे मामलों से भी जुड़ा था। ऐसे में बैठक छोड़कर अधिकारियों के बाहर जाने से टकराव और गहरा गया। विभिन्न दलों के पार्षदों का एक मंच पर आकर धरना देना नगर निगम की राजनीति में महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।

तीन करोड़ का भुगतान कैसे हुआ? महापौर ने उठाई जवाबदेही की मांग

बैठक में 15वें वित्त आयोग की धनराशि से जुड़े तीन करोड़ रुपये के भुगतान का मुद्दा भी प्रमुखता से उठना था। महापौर प्रमिला पांडेय ने सवाल किया कि जब वह 15वें वित्त आयोग से संबंधित समिति की अध्यक्ष हैं, तो उनकी जानकारी के बिना तीन करोड़ रुपये का भुगतान कैसे कर दिया गया?

महापौर ने पूरे प्रकरण की जानकारी कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) को देने की बात कही। सवाल यह है कि भुगतान किस प्रक्रिया के तहत किया गया, किस स्तर पर मंजूरी दी गई और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही क्या है? इन बिंदुओं पर आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आना बाकी है।

तीन करोड़ रुपये के भुगतान को लेकर उठे सवालों ने वित्तीय पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही पर बहस तेज कर दी है। नगर निगम की कार्यप्रणाली पर नजर रखने वालों के लिए यह मामला इसलिए भी अहम है, क्योंकि बैठक में बजट, निविदाओं और खर्च का ब्योरा सार्वजनिक करने जैसे प्रस्तावों पर भी चर्चा प्रस्तावित थी।

कूड़ा उठान के टेंडर से कन्वेंशन सेंटर तक घिरने थे अधिकारी

कार्यकारिणी की बैठक का एजेंडा कई अहम मुद्दों से भरा था। घर-घर कूड़ा उठान के टेंडर, मंगल भवन की समितियों को निरस्त करने और हॉट मिक्स प्लांट के टेंडरों की जांच के लिए गठित समिति को भंग करने जैसे विषयों पर चर्चा होनी थी। चुन्नीगंज स्थित कन्वेंशन सेंटर की आय में नगर निगम को हिस्सा नहीं मिलने का मामला भी एजेंडे में शामिल था।

इन मुद्दों पर पार्षदों को अधिकारियों से जवाब मांगना था। खासकर टेंडर प्रक्रिया और जांच से जुड़े मामलों में पारदर्शिता तथा जिम्मेदारी तय करने की मांग महत्वपूर्ण थी। इसके अलावा नगर निगम निधि से स्वीकृत कार्यों, निविदाओं, बजट आवंटन और खर्च का ब्योरा नगर निगम की वेबसाइट पर सार्वजनिक करने का प्रस्ताव भी रखा जाना था।

लेकिन बैठक की शुरुआत में ही विवाद होने के कारण इन सवालों पर चर्चा नहीं हो सकी। नतीजतन, जिन मामलों में अधिकारियों से जवाब मांगा जाना था, वे फिलहाल अनुत्तरित रह गए।

सदन के फैसलों पर भी तनातनी, निंदा प्रस्ताव लाने की तैयारी

कार्यकारिणी और सदन के फैसलों को निरस्त किए जाने को लेकर जनप्रतिनिधियों में पहले से नाराजगी थी। उपसभापति अभिनव शुक्ला की अगुवाई में नगर आयुक्त के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाने की तैयारी भी इसी असंतोष से जुड़ी है।

बुधवार को हुए घटनाक्रम ने इस विवाद को और हवा दे दी। धरने पर बैठे पार्षदों के विरोध ने साफ कर दिया कि मामला केवल बैठक में बैठने को लेकर हुए विवाद तक सीमित नहीं रह गया है। अब टकराव के केंद्र में फैसलों की वैधता, अधिकारियों की जवाबदेही और निर्वाचित प्रतिनिधियों के अधिकार जैसे मुद्दे भी हैं।

अब जवाबदेही तय होगी या फिर टलेंगे सवाल?

नगर निगम में बुधवार को जो हुआ, उसने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। तीन करोड़ रुपये के भुगतान की प्रक्रिया क्या थी? कूड़ा उठान और हॉट मिक्स प्लांट के टेंडरों पर क्या कार्रवाई हुई? कन्वेंशन सेंटर की आय में नगर निगम की हिस्सेदारी का मामला कहां तक पहुंचा? और सदन तथा कार्यकारिणी के फैसलों को निरस्त करने के पीछे क्या आधार था?

इन सवालों पर चर्चा और जवाब की उम्मीद के बीच बैठक का विवाद के कारण बाधित हो जाना नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। अब निगाहें नगर आयुक्त के खिलाफ प्रस्तावित निंदा प्रस्ताव और तीन करोड़ रुपये के भुगतान पर प्रशासन के आधिकारिक पक्ष पर टिकी हैं। शहर की सफाई, विकास कार्यों और करोड़ों रुपये के वित्तीय फैसलों से जुड़े सवालों का जवाब मिलना जरूरी है। टकराव चाहे जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच हो, उसका खामियाजा अंततः शहर की व्यवस्था को भुगतना पड़ता है।

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