2027 की सियासी बिसात पर आजम खान कितने अहम? अखिलेश की मुलाकात के पीछे मुस्लिम वोटों से लेकर चुनावी रणनीति तक के मायने

2027 की सियासी बिसात पर आजम खान कितने अहम? अखिलेश की मुलाकात के पीछे मुस्लिम वोटों से लेकर चुनावी रणनीति तक के मायने

रामपुर जेल में 45 मिनट की मुलाकात, परिवार से भी मिले सपा प्रमुख; पुराने रिश्तों को मजबूत करने और चुनावी समीकरण साधने की कोशिश के तौर पर देखी जा रही मुलाकात

(Today crime news)

उत्तर प्रदेश रामपुर/लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव और पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान की मुलाकात ने प्रदेश की सियासत में नई चर्चा छेड़ दी है। गुरुवार, 22 अक्टूबर को अखिलेश यादव रामपुर जिला जेल पहुंचे और आजम खान से करीब 45 मिनट तक बातचीत की। इसके बाद वह आजम खान के परिवार से मिलने उनके आवास भी पहुंचे। पिछले करीब 13 महीनों में दोनों नेताओं की यह तीसरी मुलाकात बताई जा रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अखिलेश की इस सक्रियता के पीछे पुराने राजनीतिक रिश्तों को निभाने की भावना है या 2027 के चुनाव की रणनीति भी काम कर रही है।

मुस्लिम मतदाताओं के बीच पकड़ अहम

आजम खान समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे हैं। रामपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनकी लंबे समय से प्रभावशाली पहचान रही है। मुस्लिम मतदाताओं के बीच उनकी राजनीतिक पकड़ सपा के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में विधानसभा चुनाव से पहले उनसे संवाद बनाए रखना पार्टी के पारंपरिक समर्थक वर्ग को भरोसा देने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

हालांकि, यह मानना सही नहीं होगा कि आजम खान के प्रभाव वाले सभी मतदाता किसी एक नेता के इशारे पर मतदान करेंगे। उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे, गठबंधन और क्षेत्रीय परिस्थितियां भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करती हैं। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम समेत अन्य दलों की सक्रियता भी कुछ सीटों पर मुकाबले को प्रभावित कर सकती है।

जौहर यूनिवर्सिटी और भाजपा पर निशाना

जेल में मुलाकात के बाद अखिलेश यादव ने आजम खान और उनके परिवार के खिलाफ हुई कार्रवाई को लेकर भाजपा सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि आजम खान के खिलाफ राजनीतिक कारणों से मुकदमे दर्ज किए गए और जौहर यूनिवर्सिटी को नुकसान पहुंचाया गया। अखिलेश ने शिक्षा के क्षेत्र में आजम खान के योगदान का उल्लेख करते हुए उनके सपने को आगे बढ़ाने की बात कही।

सोशल मीडिया मंच एक्स पर भी अखिलेश ने आजम खान के समर्थन में पोस्ट करते हुए लिखा, 'जो आजम थे, वो आजम हैं, वो आजम रहेंगे।' उनके इस संदेश को राजनीतिक मुश्किलों से गुजर रहे पुराने सहयोगी के साथ खड़े रहने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, भाजपा सरकार पर लगाए गए आरोप सपा प्रमुख के राजनीतिक दावे हैं।

कानूनी चुनौतियां बनीं बड़ी बाधा

आजम खान की राजनीतिक राह में कानूनी मामले अहम चुनौती बने हुए हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, उन्हें 23 सितंबर 2025 को सीतापुर जेल से रिहा किया गया था, लेकिन 17 नवंबर 2025 को दो पैन कार्ड से जुड़े मामले में सजा सुनाए जाने के बाद उन्हें और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम को फिर जेल भेज दिया गया। इस मामले में अपील और अदालतों के आदेश उनकी आगे की स्थिति के लिए महत्वपूर्ण हैं। अन्य मामलों में भी कानूनी प्रक्रिया की स्थिति अलग-अलग है।

 क्या 2027 में चुनाव लड़ पाएंगे आजम और अब्दुल्ला?

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(3) के तहत दो वर्ष या उससे अधिक की सजा होने पर चुनाव लड़ने की अयोग्यता लागू हो सकती है। सामान्यतः यह दोषसिद्धि की तारीख से शुरू होकर रिहाई के बाद छह वर्ष तक जारी रहती है। केवल जमानत या सजा निलंबित होने से अयोग्यता अपने आप समाप्त नहीं होती। दोषसिद्धि पर रोक या उसे निरस्त किए जाने जैसे न्यायिक आदेश स्थिति बदल सकते हैं। इसलिए आजम खान और अब्दुल्ला आजम की 2027 में चुनाव लड़ने की पात्रता संबंधित मामलों के प्रभावी अदालती आदेशों पर निर्भर करेगी।

पुराने रिश्ते, नई राजनीतिक जरूरत

आजम खान मुलायम सिंह यादव के करीबी रहे हैं और अखिलेश सरकार में नगर विकास मंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। रामपुर में जौहर यूनिवर्सिटी उनकी राजनीतिक पहचान का प्रमुख हिस्सा रही है। ऐसे में अखिलेश की मुलाकात को केवल व्यक्तिगत संपर्क तक सीमित करके देखना मुश्किल है।

2027 के चुनाव से पहले यह मुलाकात सपा के पुराने नेतृत्व के साथ एकजुटता दिखाने और समर्थक वर्ग में भरोसा बनाए रखने का राजनीतिक संदेश दे सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक चुनावी असर कितना होगा, यह आने वाले महीनों में पार्टी की रणनीति, कानूनी घटनाक्रम और क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरणों से स्पष्ट होगा।

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