दतिया में BJP को बड़ा झटका,अपनों की नाराजगी और कमजोर सोशल इंजीनियरिंग ने बिगाड़ा खेल

दतिया में BJP को बड़ा झटका,अपनों की नाराजगी और कमजोर सोशल इंजीनियरिंग ने बिगाड़ा खेल

कांग्रेस ने बचाई सीट, घनश्याम सिंह ने 6,016 वोटों से हराया भाजपा प्रत्याशी; जीतू पटवारी की रणनीति ने बढ़ाया सियासी कद

(Today crime news)

मध्य प्रदेश दतिया। बिहार के बांकीपुर के बाद मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर भी सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। सत्ता, संगठन और संसाधनों की ताकत के बावजूद भाजपा दतिया का किला नहीं जीत सकी। कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से पराजित कर सीट पर कांग्रेस का कब्जा बरकरार रखा।

दतिया का परिणाम केवल एक उपचुनाव की हार नहीं, बल्कि भाजपा के लिए संगठन, उम्मीदवार चयन और स्थानीय सामाजिक समीकरणों पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला संदेश माना जा रहा है। चुनाव से पहले दोनों दलों ने जीत के बड़े दावे किए थे, लेकिन मतगणना पूरी होने पर कांग्रेस के पक्ष में जनादेश ने भाजपा की रणनीति की कमजोरियों को उजागर कर दिया।

दतिया सीट पहले भी कांग्रेस के पास थी। पूर्व विधायक राजेंद्र भारती को भ्रष्टाचार के एक मामले में सजा होने के बाद सीट खाली हुई थी। ऐसे में सत्ता में रहते हुए भाजपा के सामने सीट छीनने की चुनौती थी, जबकि कांग्रेस के लिए अपने पुराने गढ़ को बचाना प्रतिष्ठा का सवाल बन गया था। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी की अगुआई में कांग्रेस ने चुनाव को केवल प्रत्याशी की लड़ाई नहीं रहने दिया, बल्कि इसे स्थानीय असंतोष, सामाजिक समीकरण और किसान मुद्दों से जोड़कर जमीन पर मजबूत अभियान चलाया।

1. नरोत्तम मिश्रा को नजरअंदाज करना भाजपा को पड़ा भारी?

दतिया को लंबे समय तक प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा का मजबूत राजनीतिक क्षेत्र माना जाता रहा है। 2023 के विधानसभा चुनाव में उनकी हार के बाद भी क्षेत्र में उनका प्रभाव और समर्थकों का बड़ा नेटवर्क बना रहा। उपचुनाव में टिकट को लेकर उनकी दावेदारी की चर्चा थी, लेकिन भाजपा ने नए चेहरे आशुतोष तिवारी को मैदान में उतार दिया।

टिकट वितरण के बाद स्थानीय स्तर पर असंतोष और विरोध की खबरें सामने आईं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शीर्ष नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद भले ही विवाद सार्वजनिक रूप से शांत हो गया, लेकिन संगठन के भीतर पैदा हुई खटास पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

दतिया के ब्राह्मण मतदाताओं में नरोत्तम मिश्रा की मजबूत पकड़ मानी जाती रही है। ऐसे में भाजपा का यह फैसला कई मतदाताओं को रास नहीं आया। चुनाव परिणाम ने यह संकेत जरूर दिया कि स्थानीय नेतृत्व को नजरअंदाज कर केवल संगठनात्मक ताकत के भरोसे चुनाव जीतना आसान नहीं है।

2. अति आत्मविश्वास में पिछड़ी सोशल इंजीनियरिंग

भाजपा लंबे समय से मजबूत सामाजिक समीकरण और बूथ प्रबंधन के दम पर चुनावी बढ़त बनाती रही है। दतिया में हालांकि पार्टी का यह ब्रह्मास्त्र अपेक्षित असर नहीं दिखा सका।

ब्राह्मण मतदाताओं के बीच असंतोष की चर्चा के साथ कुशवाहा, लोधी, यादव, पाल, रावत और अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं को साधने के लिए पर्याप्त राजनीतिक मेहनत नहीं दिखी। मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में ओबीसी समर्थन को लेकर भाजपा आश्वस्त नजर आई, लेकिन दतिया में स्थानीय जातीय समीकरण अलग दिशा में जाते दिखाई दिए।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि टिकट चयन से पहले स्थानीय नेताओं और प्रभावशाली सामाजिक समूहों को भरोसे में लिया जाता तो चुनावी तस्वीर अलग हो सकती थी।

3. ठाकुर, जाटव और ओबीसी मतों पर कांग्रेस की मजबूत पकड़ 

कांग्रेस ने चुनाव को केवल अपने पारंपरिक वोट बैंक तक सीमित नहीं रखा। पार्टी ने जाटव मतदाताओं के साथ-साथ लोधी, पाल, रावत और अन्य ओबीसी समुदायों तक पहुंच बनाने की कोशिश की।

स्थानीय नेताओं के जरिए सामाजिक समूहों से लगातार संपर्क किया गया। कांग्रेस ने भाजपा से नाराज मतदाताओं को भी अपने पक्ष में जोड़ने का प्रयास किया। नतीजों से संकेत मिला कि कांग्रेस अपने पारंपरिक समर्थन को बचाने के साथ कुछ ‘फ्लोटिंग वोट’ भी अपनी ओर खींचने में सफल रही।

4. आजाद समाज पार्टी ने बढ़ाई भाजपा की मुश्किल

दतिया उपचुनाव में आजाद समाज पार्टी के प्रदर्शन ने भी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाया। पार्टी प्रत्याशी दामोदर यादव ‘मंडल’ को 22 हजार से अधिक वोट मिलने की चर्चा ने राजनीतिक समीकरणों को और दिलचस्प बना दिया।

भाजपा की हार का अंतर 6,016 वोट रहा। ऐसे में तीसरे दल को मिले वोटों ने चुनावी गणित पर असर डाला या नहीं, यह राजनीतिक बहस का विषय है। हालांकि यह साफ है कि विपक्षी और असंतुष्ट मतों का बिखराव भाजपा के लिए राहत नहीं बन सका।

5. किसान मुद्दे और खाद की किल्लत भी बनी नाराजगी की वजह

दतिया के ग्रामीण क्षेत्रों में खेती-किसानी से जुड़े मुद्दे चुनाव के दौरान लगातार चर्चा में रहे। खाद और उर्वरक की उपलब्धता, आपूर्ति व्यवस्था में पारदर्शिता, सोयाबीन किसानों की समस्याएं, फसलों के उचित दाम और कृषि उत्पादों के बाजार से जुड़े सवालों ने ग्रामीण मतदाताओं की नाराजगी को बढ़ाया।

कांग्रेस ने इन मुद्दों को चुनावी अभियान में प्रमुखता से उठाया और किसानों से सीधे संवाद किया। ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा के खिलाफ बनी असंतोष की धार को कांग्रेस ने राजनीतिक समर्थन में बदलने का प्रयास किया।

जीत का सेहरा जीतू पटवारी के सिर

दतिया में जीत का परचम घनश्याम सिंह ने लहराया, लेकिन इस जीत का राजनीतिक श्रेय प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी को भी जाता दिख रहा है। उम्मीदवार चयन से लेकर चुनावी रणनीति, सामाजिक समीकरणों की पहचान, भाजपा से नाराज मतदाताओं तक पहुंच और डोर-टू-डोर अभियान में पटवारी की सक्रिय भूमिका रही।

कांग्रेस ने ब्राह्मण मतदाताओं के बीच भाजपा के भीतर की नाराजगी को मुद्दा बनाया, जाटव और अन्य पारंपरिक वोटों को संभाले रखा तथा किसान और ग्रामीण समस्याओं को चुनावी बहस के केंद्र में रखा।

दतिया का नतीजा कांग्रेस के लिए केवल एक सीट बचाने की जीत नहीं, बल्कि प्रदेश में संगठन के मनोबल को बढ़ाने वाला संदेश है। वहीं भाजपा के लिए यह परिणाम चेतावनी है कि स्थानीय नेतृत्व की अनदेखी, टिकट चयन में असंतोष और सामाजिक समीकरणों को हल्के में लेने की कीमत सत्ता में रहते हुए भी चुकानी पड़ सकती है।

दतिया ने साफ संदेश दिया है, चुनाव केवल सत्ता की ताकत से नहीं, बल्कि स्थानीय भरोसे, संगठन की एकजुटता और जमीन पर बने सामाजिक समीकरणों से जीते जाते हैं।

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